Saturday, December 7, 2013

दुनिया में कोई कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, मन के आगे सब कोई हर जाता है। लेकिन इसमें भी अपवाद सम्भव हैं , एक मन का दूसरे मन पर विश्वास ही एक मनुष्य को शीशे जैसी साफ़ आँखे दे सकता है। विश्वास एक ऐसी शक्ति है, जो न आपको हारने देती है और न ही आपके मन कि चंचलता को जीतने। लेकिन विश्वास भी सांसारिकता से कलुषित हो कर अंध-विश्वास में बदल सकता है। और जब ऐसा होता है तो मनुष्य अपने आप कि भेट स्वयं चढ़ जाता है। सही क्या है और गलत क्या है - इसका भास् उससे दूर हो जाता है और वह भाग्य , दुनिया और यहाँ तक कि भगवान् को भी दोष देने लग जाता है। ऐसे में एक और तत्व ऐसा है जो आपके विश्वास को न केवल डिगने से बचा सकता है बल्कि उसको अन्धविश्वास कि परिणति से भी बचाता है - और वह है श्रद्धा। श्रद्धा वह तत्व है जो सही और गलत का अंतर करने कि नीर-क्षीर विवेकी बुध्धि प्रकट करती है। और जरुरी नहीं है कि श्रद्धा आपको भगवान् में ही हो - श्रद्धा सम्बन्ध में भी हो सकती है , प्रेम में भी हो सकती है, विद्या में भी हो सकती है और काल में भी। चुनाव आपका यहाँ स्वयं है - आप मन के साथ बह जाना चुनते हैं या फिर श्रद्धा से आगे बढ़ कर सही चुनाव के साथ एक सफल जीवन बितानां।

|| श्रध्दावान लभते ज्ञानं ||